पिता

रात के अंतिम पहर में नींद के बीहड़ से मीलों दूर घूमने निकलता हूँ जब अपने ही भीतर पाता हूँ तुम्हें किसी बंद दरवाज़े सा झांकने पर भीतर दीखता है तुम्हारा रक्त-रंजित ललाट तुम वह नहीं थे जो हो लौट आता हूँ सहम कर न चाहते हुए भी तुमने व्यवस्था को गहा लड़ते रहे सब … Read more

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