गुलज़ार

1)

चौदहवीं रात के इस चाँद तले
सुरमई रात में साहिल के क़रीब 
दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू 
ईसा के हाथ से गिर जाए सलीब 
बुद्ध का ध्यान चटख जाए ,कसम से 
तुझ को बर्दाश्त न कर पाए खुदा भी 

दूधिया जोड़े में आ जाए जो तू 
चौदहवीं रात के इस चाँद तले !

2)

छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर – कान बनाकर
नाक सजाकर –
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला –
तेरा उपला –
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था –
इक मुन्ना था –
इक दशरथ था –
बरसों बाद – मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया !

3)

रिश्ते बस रिश्ते होते हैं
कुछ इक पल के
कुछ दो पल के

कुछ परों से हल्के होते हैं
बरसों के तले चलते-चलते
भारी-भरकम हो जाते हैं

कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से
बरसों के तले गलते-गलते
हलके-फुलके हो जाते हैं

नाम होते हैं रिश्तों के
कुछ रिश्ते नाम के होते हैं
रिश्ता वह अगर मर जाये भी
बस नाम से जीना होता है

बस नाम से जीना होता है
रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

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